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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(SP1): 228-238

राजस्थान के सिंचित उत्तरी पश्चिमी मैदान कृषि-जलवायु प्रदेश में भू-उपयोग : एक भौगोलिक विश्लेषण

Author Name: राजपाल

1. सहायक आचार्य, भूगोल, सेठ बिहारी लाल छाबड़ा राजकीय महाविधालय अनूपगढ़ जिला श्रीगंगानगर, राजस्थान, भारत

Abstract

<p>यह अध्ययन राजस्थान के<em>&nbsp;</em>श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़<em>&nbsp;</em>जिलों में पिछले 40<em> </em>वर्षों में हुए भूमि उपयोग और भूमि आवरण परिवर्तनों का विश्लेषण करता है। इस क्षेत्र के कायाकल्प का मुख्य कारक<em>&nbsp;</em>गंग नहर तथा इंदिरा गांधी नहर परियोजना रही है<em>, </em>जिसने एक शुष्क मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र को सघन कृषि क्षेत्र में बदल दिया। वर्ष 1985<em> </em>में कृषि भूमि बिखरी हुई और परती भूमि के (Fallow Land)<em> </em>साथ थी। वर्ष <em>202</em>5<em> </em>तक<em> </em>कृषि घनत्व अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गया है। उन्नत मशीनीकरण और सिंचाई विस्तार के कारण अब लगभग<em>&nbsp;</em>70-75%<em>&nbsp;</em>भूमि पर साल भर खेती की जाने लगी है, क्षेत्र का भविष्य अब <em>&#39;</em>अधिक पानी<em>&#39; </em>के उपयोग पर नहीं<em>, </em>बल्कि <em>&#39;</em>पानी की हर बूंद की कार्यकुशलता<em>&#39; </em>पर निर्भर है। पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए स्थानीय मरुस्थलीय वनस्पतियों का कृषि के साथ सह-अस्तित्व अनिवार्य है। अध्ययन क्षेत्र में वर्ष 1985<em> </em>में बंजर भूमि (रेतीले टीले) का प्रभुत्व था। चार दशकों में<em> </em>टीलों के समतलीकरण और नहरी पानी की पहुँच के कारण बंजर भूमि का क्षेत्रफल<em>&nbsp;</em>60%<em> </em>से घटकर लगभग 25%<em>&nbsp;</em>रह गया है। अब केवल वही क्षेत्र बंजर है जो भौगोलिक रूप से दुर्गम है। क्षेत्र में शहरी बस्तियों (लाल रंग) का क्षेत्रफल वर्ष <em>1985 </em>की तुलना में 202<em>5</em><em> </em>में<em>&nbsp;</em>300%<em> </em>से अधिक<em>&nbsp;</em>बढ़ा है। यह कृषि-आधारित उद्योगों<em>, </em>मंडियों और बेहतर सड़क संपर्क के कारण हुआ है<em>, </em>जिससे ग्रामीण बस्तियाँ छोटे शहरी केंद्रों में विकसित हो गई<em> </em>हैं। क्षेत्र में वर्ष 1995<em> </em>से 2015<em> </em>के बीच<em>&nbsp;&#39;</em>सेम<em>&#39; </em>(Waterlogging)<em>&nbsp;</em>और मृदा लवणीयता एक गंभीर संकट के रूप में उभरी। हालांकि<em>, </em>वर्तमान<em> </em>समय के मानचित्रों से पता चलता है कि आधुनिक ड्रेनेज तकनीकों और जिप्सम के उपयोग से इस समस्या को काफी हद तक प्रबन्धन<em> </em>किया गया है। पिछले<em> </em>40<em> </em>वर्षों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र अब<em>&nbsp;&#39;</em>विस्तार चरण<em>&#39; </em>से निकलकर<em>&nbsp;&#39;</em>स्थिरीकरण और प्रबंधन चरण<em>&#39; </em>में प्रवेश कर चुका है। भूमि उपयोग अब अपनी भौगोलिक सीमा के करीब है, और भविष्य की खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए अब<em>&nbsp;&#39;</em>क्षैतिज विस्तार<em>&#39;</em> के बजाय<em>&nbsp;&#39;</em>ऊर्ध्वाधर उत्पादकता<em>&#39; </em>और<em>&nbsp;</em>संवर्धन<em>&nbsp;(</em>जैसे सूक्ष्म सिंचाई और जैविक खेती) पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है।</p>

Keywords

भू-उपयोग, भूमि उपयोग परिवर्तन, कृषि-जलवायु प्रदेश, सिंचित उत्तरी पश्चिमी मैदान, राजस्थान, नहरी सिंचाई, इंदिरा गांधी नहर परियोजना, कृषि घनत्व, शहरीकरण, मृदा लवणीयता, सेम (जल-जमाव), GIS, रिमोट सेंसिंग।