यह शोध पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचनाओं के ऐतिहासिक विकास और उनके द्वारा निर्मित जेंडर असमानता का समकालीन परिप्रेक्ष्य में आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जेंडर असमानता केवल जैविक अंतर पर आधारित नहीं है, बल्कि सामाजिक निर्माण, सत्ता-संरचना, पितृसत्तात्मक संबंधों और संस्थागत पूर्वाग्रहों का परिणाम है।
शोध का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किस प्रकार पितृसत्ता एक संरचनात्मक व्यवस्था के रूप में परिवार, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राज्य में लैंगिक भेदभाव को पुनरुत्पादित करती रही है तथा आधुनिक लोकतांत्रिक और मानवाधिकार आधारित ढांचों के बावजूद यह असमानता क्यों बनी हुई है? शोध में ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक तथा अतःविषयक पद्धति का प्रयोग किया गया है, जिसमें नारीवादी, समाजशास्त्रीय और राजनीतिक दृष्टिकोणों का समन्वय किया गया है। यह शोध जेंडर असमानता की ऐतिहासिक जड़ों, पितृसत्तात्मक संरचनाओं व आर्थिक विषमताओं के अध्ययन के साथ-साथ औपनिवेशिक व आधुनिक काल के उन महापुरुषों के योगदान को भी रेखांकित करता है, जिन्होंने महिलाओं से संबंधित सामाजिक कुरीतियों को मिटाने व उन्हें जागृत कर शिक्षा से जोड़ने का कार्य किया तथा वर्तमान में महिलाओं की शिक्षा, राजनीतिक सहभागिता व कानूनी-नीतिगत हस्तक्षेपों का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
अध्ययन बताता है कि शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व व रोजगार के क्षेत्र में काफी सुधार हुए हैं, लेकिन वेतन अंतर, घरेलू निर्णय निर्माण में विषमता और लैंगिक हिंसा जैसी समस्याएं अभी भी गंभीर रूप में विद्यमान हैं। शोध यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि जेंडर समानता की प्राप्ति हेतु विधायी सुधारों के साथ-साथ सामाजिक चेतना, संस्थागत परिवर्तन और जेंडर न्याय आधारित विकास मॉडल को अपनाना अनिवार्य है तथा डिजिटल जेंडर विभाजन, ट्रांसजेंडर अधिकारों, अवैतनिक देखभाल कार्य के बोझ को कम करने व जेंडर बजटिंग पर कार्य करने की आवश्यकता है।
पितृसत्ता, नारीवाद, जेंडर न्याय, सामाजिक संरचना, तीन तलाक।
. पितृसत्ता से समानता की ओर: जेंडर असमानता का ऐतिहासिक व समकालीन विश्लेषण. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(SP1):31-36
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