लैंगिक समानता न केवल एक मौलिक मानवाधिकार है, बल्कि एक शांतिपूर्ण एवं समृद्ध समाज के निर्माण का महत्वपूर्ण आधारस्तंभ भी है। भारत जैसे विकासशील देश में लैंगिक समानता न केवल सामाजिक न्याय का विषय है वरन यह आर्थिक समृद्धि व् सतत विकास के लिए भी अनिवार्य है। जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होंगी तभी समाज और देश का विकास तेजी से हो सकता है। भारत सरकार ने लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं और कार्यक्रम शुरू किए हैं जिसमें महिलाओं को शिक्षित करना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, स्वास्थ्य सेवाएं सुधारना और महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकना आदि शामिल है। वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम की 2025 की रिपोर्ट में भारत को 148 देशों में से 131वाँ स्थान दिया गया है, जो इस दिशा में और अधिक प्रयासों की आवश्यकताओं को सुनिश्चित करता है। भारत जैसे पितृसत्ताक देश में लैंगिक समानता प्राप्त करने में कई चुनौतियाँ हैं, जैसे सामाजिक रूढ़िवादिता, आर्थिक असमानता, शिक्षा की कमी। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए शिक्षा, जागरूकता और नीतिगत बदलाव आवश्यक हैं। लैंगिक समानता की दिशा में भारत के प्रयासों में प्रगति अवश्य हुई है लेकिन अभी भी आगे की राह कठिन है । वास्तविक लैंगिक समानता को हासिल करने में भारत को सभी क्षेत्रों जैसे सांस्कृतिक एवं पितृसत्ताक मानदंड, महिलाओं का साक्षरता दर बढ़ाना, वित्तीय समावेशन के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण, महिला अधिकारों व् सुरक्षा के लिए क़ानूनी सुधार, राजनीतिक सशक्तिकरण, ग्रामीण भारत में महिला कार्यबल में वृद्धि, लैंगिक वेतन दर में समानता आदि पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है। दरअसल लैंगिक समानता तब ही प्राप्त हो सकती है जब पुरुषों और महिलाओं- दोनों को सफलता के लिये समान मंच एवं अवसर उपलब्ध करवाए जाएँ। इस सन्दर्भ में भारत में लैंगिक समानता की वर्तमान स्थिति और पिछले दशकों में हुए बहुआयामी परिवर्तनों का विश्लेषण करना अतिआवश्यक है।
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डॉ. पूनम प्रजापति. लैंगिक समानता की ओर भारत के बढ़ते कदम-एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(SP1):253-256
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