कृषि कार्य में पूँजी नियोजन का सबसे बड़ा भाग यन्त्रों का निवेष है। कृषि यन्त्रों के प्रयोग से यद्यपि मानव श्रम का विस्थापन होता है, फिर भी कृषि कार्य सरलता एवं षिघ्रता से सम्पन्न होता है। कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों के लिए कृषि यन्त्रों का प्रयोग व्यापारिक स्तर पर कृषि कार्य करने हेतु वरदान सिद्ध हुआ है। कृषि प्रधान जिलों में भी इन यन्त्रों का प्रयोग लाभप्रद सिद्ध हुआ है। कृषि यन्त्रों के प्रयेाग से न केवल जिलों की उत्पादकता में वृद्धि हुई वरन् कृषि पर प्रति हैक्टेयर व्यय भी कम हुआ है। बढ़ती हुई मजदूरी, श्रम, समय उपलब्ध न होना, पषु शक्ति निवेष की मंदी ने यांत्रिक शक्ति निवेष को प्रोत्साहन दिया है। यांत्रिक शक्ति का अधिकाधिक प्रयोग कृषि के आधुनिकरण का महत्वपूर्ण अंग है। किसी भी औजार, उपकरण अथवा मषीनों के उपयोग जिससे कृषक को अधिक फसल उत्पादन में सहायता मिले अथवा जिससे कृषि क्रियाऐं अधिक आराम से कम समय और कम खर्च पर की जा सके यन्त्रिकरण कहते हैं। इसके द्वारा श्रम और पूँजी के अनुपात में परिवर्तन लाया जा सकता है। कृषि यन्त्रों के उपयोग से प्रति इकाई उत्पादन लागत में कमीं, श्रम की कार्य क्षमता में वृद्धि, प्रति हैक्टेयर, भू-उत्पादन में वृद्धि, कृषि कार्य में समय की बचत, भू-उपयोग में सुधार, भू- प्रबन्धन तथा पषुओं की मांग में कमीं लाई जा सकती है।
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डॉ. एस. एस. खींची, अमित कुमार. झुंझुनूं जिले में शस्य-संयोजन एवं शस्य वैविध्य प्रदेशों का एक भौगोलिक अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(SP1):257-264
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