प्रस्तुत शोध-पत्र हिंदी कहानी में यथार्थवाद की विकास-यात्रा और उसके निरंतर बदलते स्वरूप का अनुशीलन करता है। यह विवेचन प्रेमचंद-पूर्व युग के सुधारवादी एवं आदर्शोन्मुख यथार्थ से आरंभ होकर प्रेमचंद के आदर्श से नग्न यथार्थ की ओर बढ़ते सफर (’पंच परमेश्वर’ से ’कफन’ तक) और फिर स्वातंत्र्योत्तर आधुनिकता-बोध, नई कहानी आंदोलन तथा अस्तित्ववादी यथार्थ तक विस्तृत है। यह अध्ययन दर्शाता है कि किस प्रकार कहानी का यथार्थ केवल सामाजिक चित्रण न रहकर व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व, महानगरीय अकेलेपन, स्त्री-चेतना और हाशिये के समाज की आवाज़ों तक पहुँचा है। इस प्रकार यथार्थ के बदलते रंगों का अध्ययन वस्तुतः भारतीय समाज के मानसिक और सांस्कृतिक विकास का अध्ययन बन जाता है।
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डॉ. संगीता एम. सोलंकी. हिंदी कहानी में यथार्थ के बदलते रंग. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(SP1):271-274
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