भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में प्रस्तुत ‘भारत @2047’ का दृष्टिकोण देश को एक विकसित, आत्मनिर्भर, समावेशी तथा पर्यावरण-संवेदनशील राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की परिकल्पना करता है। यह शोध पत्र ग्रामीण–शहरी परिवर्तन तथा कृषि क्षेत्र में होने वाले संरचनात्मक, तकनीकी एवं संस्थागत बदलावों के माध्यम से सतत विकास की संभावनाओं का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारत की बड़ी जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है तथा आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि शहरी क्षेत्र आर्थिक विकास, औद्योगीकरण एवं सेवाक्षेत्र के प्रमुख केंद्र बनते जा रहे हैं। ऐसे में ग्रामीण–शहरी असंतुलन, अनियोजित शहरीकरण, कृषि संकट, बेरोजगारी, पर्यावरण क्षरण और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ सतत विकास के मार्ग में प्रमुख बाधाएँ बनकर उभरती हैं।अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि ग्रामीण परिवर्तन के अंतर्गत आधारभूत संरचना का विकास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, गैर-कृषि रोजगार के अवसरों का सृजन तथा डिजिटल और वित्तीय समावेशन अत्यंत आवश्यक है। वहीं शहरी परिवर्तन के संदर्भ में संतुलित एवं नियोजित शहरीकरण, स्मार्ट एवं हरित शहरों का विकास, किफायती आवास, स्वच्छता, सार्वजनिक परिवहन तथा ऊर्जा-दक्ष प्रणालियों पर विशेष बल दिया गया है। कृषि परिवर्तन के अंतर्गत आधुनिक तकनीकों का उपयोग, फसल विविधीकरण, जैविक एवं जल-संरक्षण आधारित खेती, किसानों की आय में वृद्धि तथा खाद्य सुरक्षा को सतत विकास के प्रमुख स्तंभ के रूप में विश्लेषित किया गया है।यह शोध पत्र द्वितीयक आँकड़ों, सरकारी नीतियों, योजना एवं नीति आयोग की रिपोर्टों तथा पूर्ववर्ती शोध अध्ययनों पर आधारित है। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत @2047 के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ग्रामीण, शहरी और कृषि क्षेत्रों के बीच समन्वित एवं संतुलित विकास अनिवार्य है। प्रभावी नीति निर्माण, तकनीकी नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी के माध्यम से ही भारत दीर्घकालीन, समावेशी एवं सतत विकास के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।
भारत @2047, ग्रामीण परिवर्तन, शहरी परिवर्तन, कृषि परिवर्तन, सतत विकास
. विकसित भारत @2047: ग्रामीण–शहरी एवं कृषि परिवर्तन के माध्यम से सतत विकास का अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(SP1):293-299
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